आर्थिक मास्टर स्ट्रोक का पोस्टमार्टम: चुनाव जीतने की कला बनाम देश चलाने की लाचारी आज के दौर में जब विकास की लहरें केवल विज्ञापनों में और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स में हिलोरे ले रही हैं, तब ज़मीनी हकीकत कुछ और ही राग अलाप रही है। स्रोतों के अनुसार, मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर फाइनली पूरी तरह से और संपूर्ण रूप से नाकाम साबित हो चुकी है। यह विश्लेषण किसी राजनीतिक द्वेष का परिणाम नहीं, बल्कि उन महान नीतियों का कच्चा चिट्ठा है जिन्होंने देश को सोने और पेट्रोल के ऐसे जाल में फंसा दिया है जहाँ से निकलने का रास्ता अब सरकार जनता से भैया, अब तुम ही मत खरीदो कहकर माँग रही है। यह साबित करता है कि चुनाव जीतने की कला और सरकार चलाने की कला में ज़मीन-आसमान का अंतर है। सोने की लंका: जब रक्षक ही भक्षक बन गए भारत के लोगों का सोने के प्रति प्रेम जगजाहिर है, लेकिन सरकार की बुद्धिमानी ने इस प्रेम को देश के लिए बोझ बना दिया। सरकार को लगा कि बाहर से आने वाले सोने को रोकने के लिए उस पर इंपोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) बढ़ाना सबसे बड़ा तीर है। ड्यूटी को 10 से 15% तक बढ़ा दिया गया। परिणाम? वही हुआ जो इंदिरा गांधी के ज़माने में होता था स्मगलिंग का स्वर्णिम युग वापस आ गया। जब लाभ का अंतर 15% हो, तो एक आम आदमी भी दुबई जाकर जेब में थोड़ा सा सोना रखकर अपने आने-जाने का टिकट निकाल लेता है। सरकार ने अनजाने में सोने की स्मगलिंग को एक प्रॉफिटेबल बिजनेस बना दिया, जिससे हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम जैसे दौर की यादें ताज़ा हो गईं। इतना ही नहीं, सरकार की सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) योजना तो मूर्खताओं की पराकाष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण है। सरकार ने जनता से कहा सोना मत खरीदो, हमें पैसे दो, हम सोने के भाव से ज़्यादा पैसे देंगे और टैक्स भी नहीं लेंगे। जनता ने सोचा वाह! लेकिन आरबीआई (RBI) ने यहाँ खुद को ही टोपी पहना ली। सरकार ने जनता से पैसा तो ले लिया पर उस पैसे से खुद सोना नहीं खरीदा। अब जब सोने के दाम आसमान छू रहे हैं, तो आरबीआई की टांगें कांप रही हैं क्योंकि उसे न केवल सोने के बढ़े हुए दाम चुकाने हैं, बल्कि ऊपर से 2.5% ब्याज और टैक्स की छूट भी देनी है। ठाकुर तो बुरी तरह फंस चुका है, और अब इस स्कीम का कोई नया संस्करण लाने की हिम्मत सरकार में नहीं बची है। आत्मनिर्भर भारत या पर-निर्भर असेंबली लाइन? अब बात करते हैं ऑटोमोबाइल सेक्टर और तेल की, जहाँ “मेक इन इंडिया” का शेर दरअसल विदेशी पुर्जों से बना एक खिलौना मात्र बनकर रह गया है। सरकार ने देश में ऐसी नीतियां बनाईं जिससे पेट्रोल की खपत कम होने के बजाय दोगुनी हो गई। 2015-16 में हम 64 अरब डॉलर का तेल मंगाते थे, जो अब बढ़कर 132 अरब डॉलर हो गया है। यह सिस्टमैटिक तरीके से किया गया तेल का खेल है। सरकार ने रेलवे जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को इतना कठिन और महंगा बना दिया कि आम आदमी के पास अपनी गाड़ी निकालने के अलावा कोई विकल्प न बचे। सीनियर सिटीजन की छूट खत्म करना, रिजर्वेशन के सर्वर को जानबूझकर जाम रखना और प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही टैक्स वसूलना ये सब इसलिए किया गया ताकि आप तंग आकर अपनी कार खरीदें और तेल फूँकें। लेकिन क्या ये कारें स्वदेशी हैं? बिल्कुल नहीं। कारों का दिमाग यानी ईसीयू (ECU), चिप्स, सेंसर्स और हाई-एंड टेक्नोलॉजी सब विदेश से आ रही है। हम भारत में केवल टायर, सीटें और लोहे की बॉडी बना रहे हैं। जब भी कोई हुंडई या सुजुकी भारत में बिकती है, तो उसका मोटा मुनाफा और रॉयल्टी डॉलर के रूप में देश से बाहर चली जाती है। सरकार पीएलआई (PLI) स्कीम के नाम पर उन कंपनियों को इंसेंटिव दे रही है जो हमारा डॉलर बाहर भेज रही हैं। यह आत्मनिर्भर नहीं बल्कि पर-निर्भर होने की दास्तां है। सड़कों का जाल और कर्ज़ का काल विकास के नाम पर बनाए गए एक्सप्रेस-वे और हाईवे का सच यह है कि एनएचएआई (NHAI) भारी विदेशी कर्ज़ के नीचे दबा हुआ है। इन सड़कों को बनाने के लिए भविष्य की कमाई को आज ही बेचा जा रहा है। मिडिल क्लास इन चमचमाती सड़कों पर टोल देकर खुशी-खुशी अपनी गाड़ियाँ दौड़ा रहा है, पर उसे यह नहीं पता कि वह विदेशी तेल और विदेशी टेक्नोलॉजी का गुलाम बनता जा रहा है। जैसे-जैसे डॉलर की ज़रूरत बढ़ती है, देश अपनी संप्रभुता खोने लगता है क्योंकि उसे हर बात के लिए विदेशी ग्राहकों और उनकी शर्तों के सामने झुकना पड़ता है। निष्कर्ष: त्याग की अपील और रोड शो का विरोधाभास अंत में, जब सारी नीतियां सुपर फ्लॉप हो गईं और विदेशी मुद्रा भंडार पर संकट मंडराने लगा, तो साक्षात मोदी जी अवतरित हुए और जनता से अपील करने लगेभैया, सोना मत खरीदो, कारों का इस्तेमाल कम करो, वर्क फ्रॉम होम करो। यह वैसी ही बात है कि पहले आपने लोगों को मीठा खाने की आदत डाली, हलवाई की दुकानें खुलवाईं और जब सबको डायबिटीज हो गई, तो आप कह रहे हैं कि चीनी मत खाओ। विडंबना देखिए, जनता को कार न चलाने की सलाह देने वाले खुद करोड़ों के हवाई जहाजों में उड़ रहे हैं और भव्य रोड शो निकाल रहे हैं। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि गलत प्राथमिकताओं और केवल हेडलाइन मैनेजमेंट के चक्कर में देश को एक ऐसे आर्थिक गड्ढे में धकेल दिया गया है, जहाँ से वापसी का रास्ता फिलहाल दिखाई नहीं देता। यह नीतियों की विफलता का वह सटीक उदाहरण है जिसे आने वाली पीढ़ियाँ एक सबक के रूप में याद रखेंगी। Kanthak Suryatal Post Views: 980 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation अतिरेक्यांशी संपर्क; लातूर–नांदेड जिल्ह्यातील तीन जणांची एटीएसकडून चौकशी नाशिक त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभमेळा बोधचिन्हाचे मुख्यमंत्री, दोन्ही उपमुख्यमंत्री आणि मान्यवरांच्या हस्ते अनावरण