एक दिन मेरे मन में एक विचार आया लोग नदियों में स्नान करके अपने पाप धो लेते हैं… तो क्यों न मैं भी अपने जीवन में जाने-अनजाने किए गए पापों को धो लूँ? यही सोचकर मैं गोदावरी के किनारे पहुँचा… पर जैसे ही पानी में हाथ डालने लगा, मेरे कदम ठिठक गए… पानी गंदा था, बदबू आ रही थी… मानो नदी स्वयं पीड़ा में कह रही हो “मनुष्य अपने पाप धोने आता है… पर मेरे भीतर ही पापों का अंबार छोड़ जाता है…” मेरा मन व्यथित हो उठा… मैं आगे बढ़ा और सोचा चलो कालेश्वर-विष्णुपुरी चलते हैं… पर वहाँ भी पानी ठहरा हुआ था… अंदर से आवाज आई “जहाँ प्रवाह नहीं, वहाँ शुद्धि कैसे?” फिर मुझे त्रिवेणी संगम की याद आई… तीन पवित्र नदियों का संगम… सोचा — आज तो सारे पाप धुल जाएँगे… वहाँ पहुँचा तो दो नदियाँ दिखाई दीं, तीसरी अदृश्य… पंडित ने कहा — “तीसरी सरस्वती है, जो दिखाई नहीं देती…” मैं मुस्कुराया और मन ही मन कहा “पाप भी तो दिखाई नहीं देते!” और मैंने डुबकी लगा ली… डुबकी लगाने के बाद शरीर तो हल्का हुआ, पर मन में एक प्रश्न उठ खड़ा हुआ “क्या सच में मेरे पाप धुल गए?” मैंने नदियों से पूछा “मैंने अपने पाप तुम्हें सौंप दिए, अब तुम उनका क्या करोगी?” नदियाँ बोलीं “हम तो पहले ही मनुष्य के पाप, कचरे और गंदगी से भरी हैं… हम इन्हें समुद्र में बहा देती हैं…” मैं समुद्र के पास गया और वही प्रश्न पूछा… समुद्र बोला “मैं संसार का बहुत कुछ समेटे हुए हूँ… पर मनुष्य के पापों का बोझ नहीं उठा सकता… मैं इन्हें भाप बनाकर आकाश को सौंप देता हूँ…” अब मैं आकाश के पास पहुँचा… उससे पूछा “आप इन पापों का क्या करते हैं?” आकाश ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया “मैं बहुत कुछ सहन करता हूँ… पर जब पाप और प्रदूषण अत्यधिक बढ़ जाते हैं… तो मैं भी रो पड़ता हूँ…” “और मेरे वही आँसू… तेज़ वर्षा, तूफान और आपदा बनकर पृथ्वी पर गिरते हैं…” अब मैं अंतिम आशा लेकर धरती माता के पास गया… और विनम्रता से पूछा “माँ, आप तो सब कुछ अपने भीतर समा लेती हैं…” धरती माता का उत्तर सुनकर मेरा हृदय कांप उठा “बेटा… मैं माँ हूँ, सहनशील हूँ… पर अब मेरे घाव बहुत गहरे हो चुके हैं…” “प्रतिदिन मेरे सीने पर हिंसा, अन्याय, वृक्षों की कटाई, स्वार्थ, छल और बढ़ता प्रदूषण… ये सब मुझे भीतर ही भीतर तोड़ रहे हैं…” “जब यह पीड़ा असहनीय हो जाती है… तो मैं भी उत्तर देती हूँ कभी भूकंप बनकर, कभी बाढ़ बनकर, कभी तूफान, तो कभी नई-नई बीमारियों के रूप में…” “यह दंड नहीं है… यह तुम्हारे कर्मों का प्रतिबिंब है…” इस से गहरी सीख (संदेश) मिलती है पाप नदियों में नहीं धुलते… वे हमारे विचारों और कर्मों में बसे होते हैं। नदियों को स्वच्छ करने से पहले अपने मन और आचरण को स्वच्छ करना आवश्यक है। पेड़ लगाइए, प्रदूषण रोकिए, रिश्तों में सच्चाई और प्रेम लाइए, और मानवता को जीवित रखिए… तभी वास्तविक अर्थ में पापों से मुक्ति और जीवन की पवित्रता प्राप्त होगी। हमें क्या करना चाहिए “डुबकी जल में नहीं… अपने अंतर्मन में लगाइए… वहीं सच्ची शुद्धि है!” ✍️ राजेंद्र सिंघ शाहू 📞 7700063999 इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड Kanthak Suryatal Post Views: 691 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation नांदेड जिल्ह्यात ‘सामाजिक समता सप्ताह’ उत्साहात; विविध स्पर्धा संपन्न रंगभरण चित्रकला स्पर्धेतून महामानवास अभिवादन