लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव होते हैं और चुनाव की सबसे बड़ी पूंजी होती है जनता का विश्वास। लेकिन जब आंकड़े ही सवालों के घेरे में आ जाएं, तो लोकतंत्र का आईना धुंधला होने लगता है। हालिया चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल अब महज़ राजनीतिक आरोप नहीं रहे, बल्कि तकनीकी और सांख्यिकीय बहस का विषय बन चुके हैं। आंकड़ों में विसंगति- गणित बनाम वास्तविकता अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर, जो केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति भी हैं, ने जो सवाल उठाए हैं, उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनका दावा है आंध्रप्रदेश चुनाव २०२४ में हुए थे। तब लगभग 3,500 बूथों पर रात 2 बजे तक मतदान जारी रहा। लेकिन असली विवाद आंकड़ों की गति को लेकर है। आधी रात के बाद औसतन हर 20 सेकंड में एक वोट पड़ने का दावा किया गया। जबकि तकनीकी रूप से एक EVM मशीन को रीसेट होने में लगभग 14 सेकंड लगते हैं। यानी बचते हैं केवल 6 सेकंड जिसमें मतदाता की पहचान, बटन दबाना और प्रक्रिया पूरी होना संभव कैसे हुआ? यह सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि सीधा तकनीकी प्रश्न है। अगर गणित मेल नहीं खाता, तो जवाब कौन देगा? मतदान प्रतिशत का रहस्यमय उछाल 13 मई 2024 की शाम 5 बजे तक मतदान प्रतिशत 68.04% था। कुछ ही घंटों में यह बढ़कर रात 11:45 बजे 76.50% हो गया। और चार दिन बाद अंतिम आंकड़ा पहुंच गया 81.79% तक। कुछ घंटों में लगभग 13 प्रतिशत की छलांग यह सामान्य प्रशासनिक अपडेट है या डेटा प्रबंधन की गंभीर खामी? लोकतंत्र में आंकड़े केवल संख्या नहीं होते; वे जनादेश की विश्वसनीयता तय करते हैं। जब प्रतिशत अचानक छलांग लगाता है, तो संदेह भी उतनी ही तेजी से बढ़ता है।कानूनी और संस्थागत सवाल । वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सीधा सवाल उठाया है। उनका कहना है कि फॉर्म 17C, जिसमें हर बूथ का वास्तविक मतदान रिकॉर्ड होता है, उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने भी सुझाव दिया है कि फॉर्म 17C और फॉर्म 20 की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और बूथ-स्तर का डेटा तुरंत सार्वजनिक किया जाना चाहिए। जब पूर्व चुनाव आयुक्त भी पारदर्शिता की मांग करें, तो मामला राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर संस्थागत विश्वसनीयता का बन जाता है। मुद्दा मशीन नहीं, विश्वास का है बहस का केंद्र EVM की सुरक्षा नहीं है। असली प्रश्न यह है क्या जनता चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कर पा रही है? लोकतंत्र केवल सही परिणामों से नहीं चलता, बल्कि सही दिखने वाली प्रक्रिया से चलता है। यदि डेटा सार्वजनिक नहीं होगा, सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे और पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी, तो हर चुनाव परिणाम के साथ संदेह भी बढ़ता जाएगा। चुनाव आयोग को याद रखना होगा मशीनें सुरक्षित होने से लोकतंत्र सुरक्षित नहीं होता, जनता का भरोसा सुरक्षित होना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में हार-जीत से बड़ा सवाल हमेशा यही रहता है क्या जनता को यकीन है कि उसका वोट सचमुच गिना गया? Kanthak Suryatal Post Views: 648 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation आमचा एक पूल नष्ट केला आहे तर आम्ही आठ पूल पाडून बदला घेणार भविष्यात इराण पश्चिम आशियातील मोठी सामरिक शक्ती बनणार !