किसी कारणवश आज एक रिश्तेदार के यहाँ जाना हुआ। बातचीत के दौरान एक पुरानी PVC कुर्सी पर नज़र पड़ी। मैंने मुस्कराकर कहा “यह कुर्सी मुझसे ही खरीदी हुई है।” उन्होंने तुरंत कहा “हाँ! आपकी कुर्सियाँ आज भी वैसी ही मज़बूत हैं।” यह कुर्सी मैंने आज से पूरे 27 साल पहले (1998) में VIP कंपनी की बेची थी। तब उसकी कीमत मुझे 189 रुपये पड़ी और मैंने 199 रुपये में दी—मुनाफ़ा सिर्फ़ 10 रुपये। मुनाफ़ा कम था, पर ईमानदारी और गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं। आज 27 साल बाद भी वही कुर्सी वैसी ही मज़बूत खड़ी है—और उससे भी ज़्यादा मज़बूत है ग्राहक का भरोसा। आज का दौर ऑनलाइन खरीदारी का है, फिर भी मेरे पुराने ग्राहक आज भी कुछ लेना हो तो मेरी राय ज़रूर लेते हैं—चाहे मैं सामान न भी दूँ। क्योंकि उन्होंने देखा है: कम मुनाफ़े में भी अच्छी चीज़ दी जा सकती है, अगर नीयत साफ़ हो। यही सीख महानगरपालिका चुनाव के लिए भी है👇 जो उम्मीदवार जनता की सच्ची सेवा करता है, भरोसा कमाता है, और वादों को निस्वार्थ भाव से निभाता है, उसे कभी भी घर-घर जाकर हाथ जोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जनता स्वयं ऐसे सेवक को खोज लेती है। आज वादे करना आसान है, पर वक़्त आने पर निभाना ही असली परीक्षा है। 👉 अगर आज चुने गए प्रतिनिधि आज ईमानदारी से काम करें, तो कल उन्हें दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। भरोसा एक दिन में नहीं बनता, लेकिन एक ग़लत फैसले से टूट ज़रूर जाता है। इसलिए सोच-समझकर चुनिए कुर्सी के लिए नहीं, सेवा के लिए। नाम के लिए नहीं, काम के लिए। लाभ के लिए नहीं, विश्वास के लिए। जनता जागे—लोकतंत्र मजबूत बने! वोट ऐसा हो, जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व कर सकें। राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 873 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation “दलित आईचा खून, मुलीचे अपहरण आणि खासदार रस्त्यावर पळतोय; हे रामराज्य नाही, ही लोकशाहीची सार्वजनिक धिंड आहे!” बंगाल टार्गेट! ममता बॅनर्जीला नमवण्यासाठी ईडीचा वापर? बंगालमध्ये केंद्राचा सत्तासंघर्ष