तो सिर्फ़ एक प्रश्न नहीं था,
पूरे लोकतंत्र पर मंथन था।
सोचा
अगर हम राजनीतिक पार्टी देखकर वोट दें,
तो वही पार्टियाँ जो सत्ता के लिए
एक-दूसरे का सहारा लेती हैं,
वही समय आने पर
एक-दूसरे को नीचा दिखाने में
कोई कसर नहीं छोड़तीं।
अगर विपक्ष को चुनने का मन करें,
तो वहाँ भी वही आरोप-प्रत्यारोप,
वही स्वार्थ,
वही सत्ता की भूख।
फिर नज़र गई नेताओं पर
जो कल तक मंच पर
एक-दूसरे की प्रशंसा करते नहीं थकते थे,
आज वही शब्दों की मर्यादा भूलकर
एक-दूसरे के चरित्र उछालते नज़र आते हैं।
उनकी बातों से एक बात साफ़ होती है
सेवा कम,
सत्ता और धन की लालसा ज़्यादा।
अब अगर महानगरपालिका चुनाव में
खड़े उम्मीदवारों को देखें,
तो वहाँ भी कई बार
न पार्टी के प्रति निष्ठा दिखती है,
न जनता के प्रति जवाबदेही।
तो मन पूछता है
क्या ऐसे लोग
चुनकर आने के बाद
वास्तव में अपने वार्ड का विकास करेंगे?
या फिर पाँच साल
सिर्फ़ अपना भविष्य संवारेंगे?
तो फिर प्रश्न वही
वोट दें तो किसे दें?
इसी उधेड़बुन में
एक सच्चाई सामने आती है
कोई भी इंसान पूर्ण नहीं होता।
हर व्यक्ति में
अवगुण भी होते हैं और सद्गुण भी।
इसलिए
हमें भीड़ की आवाज़ नहीं,
पोस्टर और नारों को नहीं,
बल्कि अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए
किसने हमारे क्षेत्र के लिए
वास्तव में काम किया है?
कौन सुख-दुख में हमारे साथ खड़ा रहा है?
कौन सुनता है
और कौन सिर्फ़ सुनने का दिखावा करता है?
रिश्तेदारी,
पैसे,
डर या दबाव में आकर दिया गया वोट
हमें पाँच साल तक
पछतावे के सिवा कुछ नहीं देता।
लेकिन
अंतरात्मा की आवाज़ पर दिया गया वोट
विकास, विश्वास
और बेहतर भविष्य की नींव रखता है।
याद रखें
वोट सिर्फ़ एक पर्ची नहीं,
वह आपकी आवाज़,
आपकी ताक़त
और आपके बच्चों के भविष्य की चाबी है
आइए,
इस बार वोट
लालच से नहीं,
डर से नहीं,
भीड़ से नहीं
बल्कि विवेक, समझ
और सच्ची सोच से दें।
लोकतंत्र तुम्हारे सही निर्णय से ही जीवित है।
– राजेंद्र सिंघ शाहू
इलेक्ट्रिकल ट्रैनंर नांदेड
7700063999
