नांदेड़ (प्रतिनिधि)- इचलकरंजी से संतोष पीपलवा महाराष्ट्र प्रदेश खांडल विप्र संगठन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं। अध्यक्ष पद के तीन उम्मीदवारों में से दामोदर काछवाल (अमरावती) ने किसी कारणवश अपना नामांकन वापस ले लिया था। रामावतार रिणवा (नासिक) को भी विभिन्न तरीकों से समझाकर नामांकन वापस लेने को कहा गया कि उनका आवेदन रद्द हुआ है। इसके कारण केवल एक उम्मीदवार तक सिमित रह गया और संतोष पीपलवा को विजेता घोषित कर दिया गया। जनवरी में शुरू हुई चुनाव प्रक्रिया छठे महीने में समाप्त हो गई। इसमें चुनाव निर्णय लेने वाले अधिकारियों द्वारा एक बार घोषित चुनाव कार्यक्रम में बदलाव किया गया था। क्या चुनाव निर्णय लेने वाले अधिकारी ऐसा कर सकते हैं? राज्य भर के कुछ खांडल बंधुओं ने एक व्हाट्सएप ग्रुप शुरू किया है, जिसमें वे 2006 से आज तक का हिसाब मांग रहे हैं और पूछ रहे हैं कि कानूनी प्रक्रियाएं पूरी क्यों नहीं की गईं। चुनाव प्रक्रिया कानूनी या अवैध रूप से पूरी हुई। नए अध्यक्ष पिछले घोटालों के बारे में क्या करते हैं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। खांडल विप्र संगठन महाराष्ट्र क्षेत्र में 2006 के बाद बहुत घोटाले हुए। मुट्ठी भर लोगों में संगठन को अपने हाथ में रखने की इच्छा पैदा हुई और आम खांडल नागरिक चुप रहा, हैरान था कि चुनाव में क्या हुआ। लाखों रुपए के दान, उसके उपयोग का कोई हिसाब नहीं था। आज की स्थिति में, जब संगठन में कोई पदाधिकारी नहीं हैं, तब भी सोलापुर के मदनगोपाल निढाणीया बैंक लेन-देन में अपने हस्ताक्षर करते हैं। बैंक खाते कई शहरों में, जैसे ही अध्यक्ष बनाया गया, बैंक खाता बना दिया गया। किसी ने एक वेबसाइट बनाई जो 20 से 25 हजार रुपये बन सकती थी पर बनायीं गयी 2 लाख में । कुछ पदाधिकारी देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा करने, खांडल भाइयों से मिलने और उनकी सुंदर तस्वीरें फैलाने में व्यस्त थे। कुछ औषधी में रुचि रखते थे और केवल उन लोगों की प्रशंसा करने लगे जो दवा देंगे। कुछ बीएचएमबी संगठन के सदस्य थे। उन्होंने अपने संगठन की ताकत बढ़ाई और जिसने इस संगठन को शुरू किया था। उसने पैतृक पद्धति से अपने उत्तराधिकारियों को वह अधिकार दिया। जिस ने पिता की कभी उनके जीवित रहते हुए उनकी चिंता नहीं की, उनके नाम पर एक बोर्ड लगाया जाए ऐसी स्पर्धा सुरु हो गयी। इस तरह से इस संगठन को अपने हाथ में रखने की चाहत रखने वाले सभी लोगों ने अपने-अपने प्रयास जारी रखे। लेकिन महाराष्ट्र के खांडल के आम नागरिक की उन प्रयासों में कोई भागीदारी नहीं थी। खांडल विप्र संगठन की मातृसंस्था महासभा है। इसी कारण इस महासभा में अध्यक्ष पद पाने का खेल महाराष्ट्र प्रदेश संगठन में वर्ष 2006 से शुरू हुआ था। लेकिन चाहने वालों का दुर्भाग्य। लेकिन यह खेल लगातार जारी रहा। क्योंकि उनके अनुयायी तैयार थे। जब इस वर्ष का चुनाव हुआ तो दामोदर काछवाल, संतोष पिपलवा और रामावतार रिणवा तीन उम्मीदवार थे। अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों को बिना वापसी के 51 हजार रुपए का फंड भरने को कहा गया। काछवाल और पिपलवा ने पैसे भर दिए, लेकिन रामावतार रिणवा ने पैसे नहीं चुकाए। फिर वे पैसे दिए बिना चुनाव लड़ सकें, इसके लिए सुनील चोटिया नामक व्यक्ति उन्हें महासभा में ले गया। महासभा के अध्यक्ष मोहनलाल बोचीवाल का एक ऑडियो उपलब्ध है। जिसमें मोहनलाल बोचीवाल दामोदर काछवाल को निर्वाचित करवाने की बात कर रहे हैं। बाद में, सुनील चोटिया की मदद से मोहनलाल बोचीवाल बीना पैसे भरे रामावतार रिणवा को चुनाव लड़ने के लिए मदद कर रहे थे। रामावतार रिणवा, जिनकी सुनील चोटिया ने मदद की थी, उन्होंने व्हाट्सएप पर संदेश फैलाया कि सुनील चोटिया मुझ पर दबाव बना रहे हैं। बाद में, सुनील चोटिया संतोष पीपलवा के साथ फोटो खींच रहे हैं और अपनी तस्वीरें फैला रहे हैं। यानी, इस चुनाव में असली मुद्दे क्या थे और उन मुद्दों के आधार पर किसे चुना जाना चाहिए, इस पर कोई चर्चा नहीं हुई। तो वोट देने का सवाल कहां से आ गया? चुनाव से पहले संतोष पीपलवा कह रहे थे कि वे 2006 से अब तक के सभी घोटालों को उजागर करेंगे। लेकिन वे उन लोगों की मदद से निर्विरोध चुने गए, जिन पर घोटाले करने का संदेह था। गैर-वापसी योग्य स्थिति में दो उम्मीदवारों ने 51,000 रुपये का भुगतान करने वाले 1 लाख 2 हजार रुपये का क्या हुआ, यह अभी भी एक अनुत्तरित प्रश्न है। चुनाव अधिकारियों ने अवैध रूप से चुनाव प्रक्रिया का समय बढ़ा दिया। इस तरह खांडल विप्र महाराष्ट्र प्रदेश संगठन की विचित्र चुनाव प्रक्रिया समाप्त हो गई। Kanthak Suryatal Post Views: 1,252 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation 38 महिने स्थानिक गुन्हा शाखेत तोंडी आदेशावर काम करणाऱ्या पोलीस उपनिरिक्षकाला नोटीस व शिस्तभंग कार्यवाही; शहाजी उमाप यांचा आदेश सत्य और असत्य पर इंसान की भूमिका