श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी केवल सिक्ख धर्म का ही पवित्र ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं। गुरु साहिबानों ने इसमें विभिन्न उच्च कोटि के संतों, भक्तों और महापुरुषों की वाणी को स्थान देकर यह संदेश दिया कि परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग प्रेम, सत्य, सेवा, विनम्रता और नाम सिमरन है; न कि जाति, धर्म, भाषा या ऊँच-नीच का भेद। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पावन उपदेश है“अवल अलह नूर उपाइआ, कुदरत के सभ बंदे। एक नूर ते सभ जग उपजिआ, कउन भले को मंदे॥” अर्थात, परमात्मा ने एक ही नूर (ज्योति) से समस्त सृष्टि की रचना की है, इसलिए कोई भी मनुष्य ऊँचा या नीचा नहीं है। इसी प्रकार गुरु वाणी का संदेश है “एक पिता एकस के हम बारिक, तू मेरा गुर हाई।” अर्थात, हम सब एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। जब हमारा पिता एक है, तो आपसी वैर, घृणा, हिंसा और भेदभाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सिक्ख धर्म का मूल सिद्धांत है – “सरबत दा भला”, अर्थात सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण। यही कारण है कि सिक्ख धर्म सेवा, प्रेम, समानता, भाईचारे, न्याय और मानवता की शिक्षा देता है। लंगर की परंपरा, निस्वार्थ सेवा और प्रत्येक मनुष्य के सम्मान का संदेश इसी महान विचारधारा का जीवंत उदाहरण है। सिक्ख धर्म की यह सेवा-परंपरा केवल गुरुद्वारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि समय-समय पर पूरी दुनिया ने इसे प्रत्यक्ष रूप से देखा है। दिल्ली में विभिन्न आंदोलनों के दौरान भी अनेक गुरुद्वारों, सिक्ख संस्थाओं और हजारों स्वयंसेवकों ने बिना किसी जाति, धर्म, भाषा या विचारधारा का भेद किए दिन-रात गुरु का लंगर, स्वच्छ पेयजल, चाय, दवाइयाँ, कंबल, प्राथमिक उपचार तथा अन्य आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराईं। अनेक स्वयंसेवकों ने महिलाओं, बुज़ुर्गों और बच्चों की सहायता एवं सुरक्षा में भी अपनी सेवाएँ समर्पित कीं। यह सेवा किसी प्रसिद्धि, प्रचार या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के “सरबत दा भला” और निस्वार्थ सेवा के सिद्धांतों को जीवन में उतारने का जीवंत उदाहरण थी। यही सिक्ख धर्म की पहचान है कि जहाँ कोई भूखा हो वहाँ लंगर पहुँचे, जहाँ कोई असहाय हो वहाँ सहायता पहुँचे, जहाँ कोई पीड़ित हो वहाँ सेवा पहुँचे, और जहाँ मानवता संकट में हो वहाँ सिक्ख बिना किसी भेदभाव के सेवा के लिए सबसे पहले खड़ा दिखाई दे। यही गुरु साहिबानों की शिक्षाओं का वास्तविक स्वरूप है। यदि संसार का प्रत्येक व्यक्ति श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की इन शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाए, तो धर्म, जाति या भाषा के नाम पर होने वाले दंगे, हिंसा, नफरत और अराजकता स्वतः समाप्त हो सकते हैं। प्रेम, भाईचारा, सेवा और मानवता ही विश्व शांति का सच्चा मार्ग है। आइए, हम सभी गुरु साहिब की वाणी को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में भी उतारें। यदि प्रत्येक मनुष्य “सरबत दा भला” की भावना से प्रेरित होकर निस्वार्थ सेवा का संकल्प ले, तो यह संसार अधिक शांत, सुरक्षित और प्रेमपूर्ण बन सकता है। यही सच्ची श्रद्धा और मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। -राजेंद्र सिंघ शाहू इलेक्ट्रिकल ट्रेनर, नांदेड मो. 7700063999 Kanthak Suryatal Post Views: 572 Facebook WhatsApp Telegram Twitter LinkedIn Snapchat Threads Post navigation सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा बोर्ड 1956 का कानून क्यों नहीं बदला जाना चाहिए? जुने कर्ज माफ, अन् एकादिवसातच मिळणार नवे पीक कर्ज !